गुरुवार, 3 अप्रैल 2008

लघुकथा- भीड़

सडक पर भीड़ देखकर वे दोनों रूक गये।
“एक दम अभी-भी एक साइकिल सवार को कार ने ठोकर मार दी है।“ भीड़ से सूचना मिली।
“यदि शीघ्र उपचार मिल जाए, तो शायद बच जाए।”
एक आदमी ने भीड़ से निकल कर हमदर्दी जताते हुए अपने दायित्वों की इतिश्री कुछ इस नजाकत के साथ कि जैसे उसके इस कथन मात्र से घायल आदमी की डूबती साँसें लयबद्ध हो जाएँगी।
दोनों ने एक दूसरे की आँखों में देखा। एक सहमत था, दूसरा असहमत। एक मौके की गम्भीरता के साथ था, दूसरा बाद के दिनों की कानूनी उलझनों के साथ। एक को लगा कि उसे अस्पताल पहुंचाना हमारा नैतिक दायित्व है, तो दूसरा इसे प्रशासन का दायित्व मान रहा था।
अंत में पुलिस को सूचित कर देने की बात पर सहमति बनी। सूचना देने का काम दूसरे ने लिया, क्योंकि वे जहाँ खडे थे, वह चौराहा था। चौराहे के पूर्वी छोर से एक गली कटती थी। वह गली रेलवे पुल तक जाती थी और एक को उसी रास्ते से जाना था। दूसरे को चौराहे से पशिचम दिशा में बाजार की ओर जाना था, जहाँ पुलिस चौकी थी और उसके पहले पी0सी0ओ0 था।
दोनों अपनी-अपनी दिशा में चल दिये। दस कदम चलकर दूसरा फिर से भीड़ तक लौट आया। भीड धीरे धीरे कम होने लगी थी। वह उस औंधे मँह गिरे आदमी को देखने के लिए लौटा था, जिसके बारे में पुलिस कन्ट्रोल रूम में फोन कर सूचना देने जा रहा था। वह लोगों को चीर कर अंदर गया। उस आदमी को देखते ही उसके पूरे शरीर में सनसनी सी होने लगी। वह तेजी से उस आदमी पर झुका, उसे सीधा किया और उसके सीने पर अपना काल लगाकर उसकी हृदय गति जानना चाहा। उसके चेहरे पर अब परेशानी और घबराहट का मिला जुला पसीना चुहचुहाने लगा था। वह फिर उठकर मदद के लिए भीड़ की ओर देखने लगा।
पर यह क्या? वह जगह तो सांय-सांय करते हुए रेगिस्तान में बदल चुकी थी। वह अपने घायल सगे भाई को गोद में लिए बदहवास चीखने लगा, जिसे कुछ देर पहले एक कार ठोकर मार कर चली गयी थी।

2 टिप्‍पणियां:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

ऑनलाइन दुनिया में आपका स्वागत है।

zeashan zaidi ने कहा…

Amit Jee, blog per hi sahi bahut din baad apse mulakat hui.